दीपों की ज्योति में समाहित उष्मा और ऊर्जा लिए शुभ सूर्योदय

0
223

आलेख : अर्चना राय भट्ट : 07/11/2018 : पटना

दीपों की ज्योति में समाहित उष्मा और ऊर्जा लिए उदय होते भास्कर आपको गतिशीलता प्रदान करता रहे ।

भारतीय पद्धति के अनुसार प्रत्येक आराधना, उपासना व अर्चना में आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है। इस मान्यतानुसार दीपावली में भी धन के रूप में आधिभौतिक लक्ष्मी का आधिदैविक लक्ष्मी से संबंध स्वीकार करके पूजन किया जाता हैं। घरों को दीपमाला आदि से अलंकृत करना इत्यादि कार्य लक्ष्मी के आध्यात्मिक स्वरूप की शोभा को आविर्भूत करने के लिए किए जाते हैं।
धार्मिक , पौराणिक और ऐतिहासिक रूप से आज के दिन का महत्व बहुत बड़ा है इसलिए तो प्रकाश पर्व नाम पड़ा है इसका । प्रकाश का अर्थ है अंधेरे से उजाले के ओर , निर्धनता से अमीरी की ओर , अशिक्षा से शिक्षा की ओर , पाताल से आसमान की ओर , अनिश्चितता से निश्चिंतता की ओर , क्रोध से प्रेम की ओर , स्वार्थी से दानी की , पाप से पुण्य की ओर अपने आप को स्थिरता से गतिमान की ओर कदम बढ़ाने का चक्र ही प्रकाश है ।

धार्मिक पहलू देखे तो दीपावली रात्रि का त्योहार है , रात्रि के समय प्रत्येक घर में धनधान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मीजी, विघ्न-विनाशक गणेश जी और विद्या एवं कला की देवी मातेश्वरी सरस्वती देवी की पूजा-आराधना की जाती है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि अर्थात् अर्धरात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक में आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुंदर तरीक़े से सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है वहां अंश रूप में ठहर जाती हैं। इसलिए इस दिन घर-बाहर को ख़ूब साफ-सुथरा करके सजाया-संवारा जाता है। दीपावली मनाने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर स्थायी रूप से सद्गृहस्थों के घर निवास करती हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्री रामचंद्रजी चौदह वर्ष का वनवास काटकर तथा असुरी वृत्तियों के प्रतीक रावण का संहार करके अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्यावासियों ने राम के राज्यारोहण पर दीप मालाएं जलाकर महोत्सव मनाया था।

अगर बात करे इसके ऐतिहासिक पहलू का तो इसी दिन इसी दिन गुप्तवंशीय राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने ‘विक्रम संवत’ की स्थापना की थी। धर्म, गणित तथा ज्योतिष के दिग्गज विद्वानों को आमन्त्रित कर यह मुहूर्त निकलवाया कि नया संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाए।

इस दिन के और भी कुछ धार्मिक पहलू है । एक बार भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक असंख्य दीपों को जला कर दीपावली मनाई गई थी।
इसी दिन समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से लक्ष्मीजी प्रकट हुई थीं और भगवान विष्णु को अपना पति स्वीकार किया था।
इस दिन जब श्री रामचंद्र लंका से वापस आए तो उनका राज्यारोहण किया गया था। इस ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने घरों में दीपक जलाए थे।
इसी समय कृषकों के घर में नवीन अन्न आते हैं, जिसकी ख़ुशी में दीपक जलाए जाते हैं।
इसी दिन आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ था।

समूचे ब्रह्मांड को अपने दिव्यता से प्रकाशित करती सुख शांति समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश आप सबको सम्पूर्ण वर्ष पूर्णता प्रदान करते रहे ।

लक्ष्मी पूजन व दीपदान करने का शुभ मुहूर्त

लाभ योग-प्रात: 6.36 बजे से 7.59 बजे तक तथा दोपहर 4.16 बजे से शाम 5.39 बजे तक
अमृत योग-सुबह 7.59 बजे से 9.22 बजे एवं रात्रि 8.54 बजे से 10.31 बजे तक
शुभ योग-दोपहर 10.44 बजे से दोपहर 12.07 और संध्या 7.16 बजे से रात्रि 8.54 बजे तक
चर योग-दोपहर 2.53 बजे से संध्या 4.16 बजे तक और रात्रि 10.31 बजे से मध्यरात्रि 12.08 बजे तक
स्थिर लग्न में गणोश-लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त
वृश्चिक लग्न-प्रात: 7.21 बजे से 9.37 बजे तक
कुम्भ लग्न- दोपहर 1.05 बजे से 2.35 बजे तक
वृषभ लग्न-संध्या 5.41 बजे से रात्रि 7.38 बजे तक
सिंह लग्न-मध्यरात्रि 12.09 से 2.23 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11.11 बजे से दोपहर 11.55 बजे तक,
प्रदोषकाल मुहूर्त-संध्या 5.29 बजे से 7.39 बजे तक,
महानिशीथ काल मुहूर्त-रात्रि 11.44 बजे से मध्यरात्रि 12.32 बजे तक