धन्वन्तरि प्रकटोत्सव की शुभ बेला में मंगलमय सुप्रभात ,शुभ दिन शुभ सप्ताह

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आलेख : अर्चना राय भट्ट / 5-11-2018 / टेकारी (गया)

धन्वन्तरि प्रकटोत्सव की शुभ बेला में मंगलमय सुप्रभात ,शुभ दिन शुभ सप्ताह

आज 5 नवंबर है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि , भगवान धन्वन्तरि जयंती । धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अहम आज के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि वैद्य समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती भी कहते हैं। वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है। आज के दिन को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। भारत में आज के दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाया जाता है । जैन आगम में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ भी कहते हैं। धन्वंतरि ईसा से लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व हुए थे। वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे। उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्त्वपूर्ण अनुसंधान की थीं। उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए इस तरह सुश्रुत संहिता किसी एक का नहीं, बल्कि धन्वंतरि, दिवोदास और सुश्रुत तीनों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है। धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उनके जीवन के साथ अमृत का कलश जुड़ा है। वह भी सोने का कलश। अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था। उन्होंने कहा कि जरा मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। सुश्रुत उनके रासायनिक प्रयोग के उल्लेख हैं।
आज के दिन का एक और कथा है । एक बार भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आये , किसी कारण बस विष्णु जी लक्ष्मी पर नराज हो कर श्राप दिए कि 12 वर्ष यहाँ निवास करना है । लक्ष्मी दुखी मन से एक दरिद्र किसान के यहाँ रहने लगी जिसके बाद किसान के दिन आनंद से कटने लगे । 12 वर्ष उपरांत विष्णु जब लक्ष्मी को लेने आये तो किसान ने वापस ले जाने से इनकार कर दिया । तब माता लक्ष्मी उसे समझाई तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं जैसा करो। कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सांयकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी। मैं इस दिन की पूजा करने से वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। मुझे रखना है तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करना।’ यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं और भगवान देखते ही रह गए। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी भांति वह हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा करने लगा और आने वाला उसकी पूरी वंशज युगों युगों तक आज के दिन को नए बर्तन खरीद कर उसमे माँ लक्ष्मी को प्रसाद ग्रहण करने को रखते रहे नए जेवर खरीद कर माता के श्रृंगार के लिए अर्पित करते थे । यह प्रथा आज तक जारी है इस कारण आज के दिन नए जेवर और वर्तन खरीद माता लक्ष्मी को आह्वाहन करते है माता को समर्पित करते है ।
आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं ।

आज के दिन आयुष मंत्रालय प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी धनवंतरी जयंती के अवसर पर आयुर्वेद दिवस मन रहा है। इस उपलक्ष्य में आयुष मंत्रालय नीति आयोग के साथ मिलकर नई दिल्ली में आयुर्वेद में उद्यमिता और व्यापार विकास पर एक संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद क्षेत्र से जुड़े हितधारकों और उद्यमियों को कारोबार के नए अवसरों के प्रति जागरूक करना है। यह संगोष्ठी आयुर्वेद उत्पादों की बाजार हिस्सेदारी 2022 तक तीन गुना करने के आयुष मंत्रालय द्वारा तय किए गए बड़े लक्ष्य की दिशा में उठाया गया एक कदम है।

आज ही के दिन 2013 में भारत ने ऐसा कारनामा किया था, जो इतिहास में आज का दिन सदा के लिए दर्ज हो गया । भारत ने 5 नवंबर 2013 को अपना पहला मंगलयान अंतरिक्ष में रवाना किया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा द्वीप पर स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से अपने पीएसएलवी के माध्यम से इसे सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया।

आज बाबा नागार्जुन जो हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे उनकी पुण्यतिथि है , भावभीनी श्रद्धांजलि । अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत
एवं बाङ्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन ने मैथिली में यात्री उपनाम से लिखा तथा यह उपनाम उनके मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र के साथ मिलकर एकमेक हो गया।
नागार्जुन का जन्म 1911 में की ज्येष्ठ पूर्णिमा  को वर्तमान मधुबनी जिले के सतलखा में हुआ था। यह उन का ननिहाल था। उनका पैतृक गाँव वर्तमान दरभंगा जिले का तरौनी था।
वैद्यनाथ मिश्र की आरंभिक शिक्षा उक्त पारिवारिक स्थिति में लघु सिद्धांत कौमुदी और अमरकोश के सहारे आरंभ हुई। उस जमाने में मिथिलांचल के धनी अपने यहां निर्धन मेधावी छात्रों को प्रश्रय दिया करते थे। इस उम्र में बालक वैद्यनाथ ने मिथिलांचल के कई गांवों को देख लिया। बाद में विधिवत संस्कृत की पढ़ाई बनारस जाकर शुरू की।
नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। काशी में रहते हुए उन्होंने ‘वैदेह’ उपनाम से भी कविताएँ लिखी थीं।
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी जो 1929 में लहेरियासराय, दरभंगा से प्रकाशित ‘मिथिला’ नामक पत्रिका में छपी थी। उनकी पहली हिन्दी रचना ‘राम के प्रति’ नामक कविता थी जो 1934 में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘विश्वबन्धु’ में छपी थी।
नागार्जुन लगभग अड़सठ वर्ष (सन् 1929 से 1997) तक रचनाकर्म से जुड़े रहे। कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबन्ध, बाल-साहित्य — सभी विधाओं में उन्होंने कलम चलायी। मैथिली एवं संस्कृत के अतिरिक्त बाङ्ला से भी वे जुड़े रहे।
हिन्दी काव्य-मंच पर अपनी सत्यवादिता और लाग-लपेट से रहित कविताएँ लम्बे युग तक गाने के बाद आज के दिन 5 नवम्बर सन् 1998 को ख्वाजा सराय, दरभंगा, बिहार में यह रचनाकार हमारे बीच से विदा हो गया।

आज के दिन 5 नवंबर 2006 को सद्दाम हुसैन को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी. सद्दाम पर 148 लोगों की हत्या का अपराध साबित हुआ था. कोर्ट ने सद्दाम के अलावा उनके सौतेले भाई बरजान अल तिकरिती और इराक के पूर्व न्यायाधीश अवाद हामिद अल बंदर को भी मौत की सजा दी थी ।इसी मामले में पूर्व उपराष्ट्रपति ताहा यासीन रामादान को उम्रकैद और तीन अन्य लोगों को 15 साल जेल की सजा दी गई थी । 30 दिसंबर 2006 को बकरीद के दिन सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया गया था ।

आज पूरे विश्व में विश्व सुनामी जागरूकता दिवस 2018 मनाया जा रहा है । यह दिवस सुनामी के बारे में जागरूकता के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। पहला विश्व सुनामी जागरूकता दिवस 5 नवम्बर 2016 को पुरे विश्वभर में मनाया गया था। इस दिन के महत्व को समझने के लिए साल 1854 के उदाहरण को समझना बहुत जरूरी है। जापान में रहने वाले वाकायामा 5 नवंबर को एक प्रान्त में आए उच्च तीव्रता के भूकंप के बाद सुनामी को लेकर काफी चिंतित थे। उन्होंने पहाड़ी की चोटी पर जाकर चावलों के ढ़ेर में आग लगा दी थी। जब ग्रामीणो ने इस चावल के ढ़ेर में लगी आग को देखा तो लोग उसे बुझाने के लिए पहाड़ी पर चढ़ गए। उनके पहाड़ी पर चढ़ने के बाद नीचे गांव में तेज सुनामी की लहरे आई जिन्होंने पूरी तरह गांव को नष्ट कर दिया था। यह सुनामी पूर्व चेतावनी का पहला दस्तावेज उदाहरण था। जिस दिन चावलों के ढ़ेर में आग लगाई गई थी विशेषज्ञों ने उसी 5 नवंबर को सुनामी जागरूकता दिवस मनाने का फैसला किया गया ।

पानीपत की दूसरी लड़ाई आज ही के दिन 5 नवंबर 1556 को अकबर और सम्राट हेम चंद्र विक्रमादित्य के बीच लड़ी गई, सम्राट हेम चन्द्र  उत्तर भारत के राजा थे तथा  हरियाणा के  रेवाड़ी से सम्बन्ध रखते थे। हेम चन्द्र  ने अकबर की सेना को हरा कर आगरा और दिल्ली के बड़े राज्यों पर कब्जा कर लिया था।  इस राजा को विक्रमादित्य के रूप में भी जाना जाता है । पौराणिक कथा के अनुसार, पानीपत की पहली लड़ाई 21 अप्रैल 1526 को दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच लड़ा गया था।

इसी के साथ आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं , आपके घर धन्य धान्य से भरे रहे । स्वस्थ रहे खुशहाल रहे यही कामना है । आज सपाट का नया दिन आप सबके लिए शुभ और मंगलमय हो ।
जय श्री राम ।