माँ सिद्धिदात्री के आशीष तले मंगलमय सुप्रभात

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माँ सिद्धिदात्री के आशीष तले मंगलमय सुप्रभात ,

आज माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री का दिन है , सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता जो माँ की आराधना करता , ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।
आज अंतरमन की शक्ति को जगाने का यह नवमा व अंतिम दिन है। साधना के आठ पड़ावों को पार करके जब साधक सिद्धिदात्री के दरबार तक पहुंच जाता है तो दुनिया की कोई भी वस्तु उसकी पहुंच से बाहर नहीं होती। करुणामयी मां साधक की हर मुराद को पूरा कर देती हैं। मां का स्वरूप ही कल्याणक और वरदायक है। क्रियाशीलता का वर देकर वे साधक को उस हर संघर्ष के लिए सक्षम बना देती हैं, जो जीवन संघर्ष में आवश्यक है।
सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं जो माँ की कृपा से प्राप्त होती है ।
सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

मां के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करनी चाहिए। मां भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।

आज कन्या पूजन का दिन है साथ के बटुक भैरव की भी पूजा का विधान है । जहां कन्या पूजन के दौरान देवी के विभिन्न रूपों का दर्शन प्राप्त करने की मान्यता है। भैरव जिनको शिव का ही रूप माना गया है। इनके पूजन से ही मां की पूजा पूर्ण होती है।

काली तंत्र के अनुसार भैरव के पूजन से ग्रह जन्य पीड़ा से मुक्ति मिलती है तथा प्रेत बाधा भी दूर होती है। बच्चों के ग्रह जन्य रोग दूर होते हैं। इनका जप करने से सात जन्मों के संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार पूरे नवरात्र सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन कुमारी पूजन करने का विधान है। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो

आज अंतिम दिन नौ कुमारियों के चरण धोकर देवी रूप मानकर उनका पूजन कर यथा रुचि मिष्ठान, भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्र आदि देकर सत्कृत करना चाहिए। कन्या पूजन से देवी मां प्रसन्न होकर साधक के अभीष्ट की पूर्ति करती हैं। कन्या पूजन में दस वर्ष से कम उम्र की कन्या का ही पूजन करने का विधान है।
दो वर्ष की कन्या में मां के कुंवारी रूप,
तीन वर्ष की कन्या में त्रिमूर्तिनी रूप,
चार वर्ष की कन्या में कल्याणी,
पांच वर्ष की कन्या में रोहिणी,
छह वर्ष की कन्या में काली,
सात वर्ष में चंद्रिका,
आठ वर्ष की कन्या में शांभवी,
नौ वर्ष की कन्या में दुर्गा
दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरूपा माना गया है।

शास्त्रों में एक कन्या पूजन से ऐश्वर्य,
दो के पूजन से मोक्ष,
तीन के पूजन से धर्म, अर्थ, काम त्रिवर्ग की प्राप्ति, चार की अर्चना से राज्यपद,
पांच के पूजन से विद्या,
छह के पूजन से षटकर्म सिद्धि,
सात की पूजा से राज्य की,
आठ की पूजा से संपदा
नौ कुमारियों के पूजन से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।

आज नवरात्री पारण, नवमी, महागौरी पूजन, कन्‍या पूजन, नवमी हवन है आप सब माँ को माता जी का सम्पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो । आप सभी को मान सम्मान सुख शांति समृद्धि एश्वर्य प्राप्त हो ऐसी कामना करती हूँ।
जय माता जी ।